इस मुस्लिम भक्त की मजार पर जरूर रुकता है भगवान जगन्नाथ का रथ, जानिए कौन है यह भक्त

undefined भुवनेश्वर /नई दिल्ली (ऊँ टाइम्स)  कोरोना महामारी के खतरे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 18 जून को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा पर रोक लगाई गई थी। इस आदेश को वापस लेने के लिए 21 लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। इनमें एक 19 वर्षीय मुस्लिम छात्र है, जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है। दरअसल इस युवक की तुलना इतिहास के एक मुस्लिम भक्त से की जा रही है, जिसे प्रभु जगन्नाथ का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। यही वजह है कि प्रत्येक वर्ष जब भगवान की रथ यात्रा मंदिर से निकलती है तो खुद ब खुद अपने सबसे बड़े भक्त की मजार पर कुछ देर के लिए रुक जाती है। आइये जानते हैं इतिहास और वर्तमान के इस मुस्लिम भक्तों की कहानी और मजार पर रथ के रुकने के पीछे क्या है मान्यता।

आप को मालूम हो कि ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा 23 जून 2020 को आयोजित होनी है। प्रत्येक वर्ष इस रथ यात्रा में देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान का रथ खींचने के लिए आते हैं। भक्तों की इसी भीड़ को कोरोना संक्रमण के लिए बड़ा खतरा मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष रथ यात्रा पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर 21 लोगों ने पुनर्विचार याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओ में ओडिशा के न्यागढ़ जिले का रहने वाला 19 वर्षीय बीए (अर्थशास्त्र) अंतिम वर्ष का छात्र आफताब हुसैन भी शामिल है। सोशल मीडिया पर उसकी तुलना भगवान जगन्नाथ के सबसे बड़े भक्त सालबेग से हो रही है। लोग उसे दूसरा सालबेग बता रहे हैं।
आफताब हुसैन के मुताबिक बचपन से ही वह भगवान जगन्नाथ के भक्त थे। उनके दादा मुल्ताब खान भी भगवान जगन्नाथ के बड़े भक्त थे। उसके दादा ने वर्ष 1960 में इटामाटी में भगवान ब्रह्मा, विष्णु व महेश के एक मंदिर का निर्माण कराया था, जिसे त्रिनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। आफताब के अनुसार उन्होंने भगवान जगन्नाथ पर कई किताबें पढ़ीं हैं। इसससे भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी आस्था और गहरी हो गई। आफताब बताते हैं कि उनके पिता इमदाद हुसैन, मां राशिदा बेगम और छोटे भाई अनमोल ने कभी उन्हें भगवान जगन्नाथ की अराधना करने से नहीं रोका। मीडिया से बातचीत में आफताब ने बताया कि उन्हें मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है, इसलिए वह कभी मंदिर के अंदर नहीं गए हैं। आफताब मानते हैं कि ब्रह्माण को बनाने वाले केवल एक हैं भगवान जगन्नाथ, जिसने सबको बनाया है। सालबेग, 17वीं शताब्दी की शुरूआत में मुगलिया शासन के एक सैनिक थे, जिन्हें भगवान जगन्नाथ का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है। सालबेग की माता ब्राह्मण थीं, जबकि पिता मुस्लिम थे। उनके पिता मुगल सेना में सूबेदार थे। इसलिए सालबेग भी मुगल सेना में भर्ती हो गए थे। एक बार मुगल सेना की तरफ से लड़ते हुए सालबेग बुरी तरह से घायल हो गए थे। तमाम इलाज के बावजूद उनका घाव सही नहीं हो रहा था। इस पर उनकी मां ने भगवान जगन्नाथ की पूजा की और उनसे भी प्रभु की शरण में जाने को कहा। मां की बात मानकर सालबेग ने भगवान जगन्नाथ की प्रार्थना शुरू कर दी। उनकी पूजा से खुश होकर जल्द ही भगवान जगन्नाथ ने सालबेग को सपने में दर्शन दिया। अगले दिन जब उनकी आंख खुली तो शरीर के सारे घाव सही हो चुके थे! इसके बाद सालबेग ने मंदिर में जागर भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं दिया गया। इसके बाद सालबेग मंदिर के बाहर ही बैठकर भगवान की अराधना में लीन हो गए। इस दौरान उन्होंने भगवान जगन्नाथ पर कई भक्ति गीत व कविताएं लिखीं। उड़ीया भाषा में लिखे उनके गीत काफी प्रसिद्ध हुए, बावजूद उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं मिला। इस पर सालबेग ने एक बार कहा था कि अगर उनकी भक्ति सच्ची है तो उनके मरने के बाद भगवान जगन्नाथ खुद उनकी जमार पर दर्शन देने के लिए आएंगे। सालबेग की मौत के बाद उन्हें जगन्नाथ मंदिर और गुंडिचा मंदिर के बीच ग्रांड रोड के करीब दफना दिया गया।
मजार पर इस लिए रुकता है भगवान जगन्नाथ का रथ- ऐसी मान्यता है कि सालबेग की मृत्यु के बाद जब रथ यात्रा निकली तो रथ के पहिये मजार के पास जाकर थम गए। लोगों ने काफी कोशिश की, लेकिन रथ मजार के सामने से नहीं हिला। तब एक व्यक्ति ने तत्कालीन ओडिशा के राजा से कहा कि वह भगवान के भक्त सालबेग का जयकारा लगवाएं। उस व्यक्ति की सलाह मानकर जैसे ही सालबेग का जयघोष हुआ, रथ अपने आप चल पड़ा। ऐसी मान्यता है कि तभी से भगवान जगन्नाथ की इच्छा अनुरूप उनकी सालाना आयोजित होने वाली तीन किलोमीटर लंबी नगर रथ यात्रा को कुछ देर के लिए उनके भक्त सालबेग की मजार पर रोका जाता है।

लेखक: OM TIMES News Paper India

(Regd. & App. by- Govt. of India ) प्रधान सम्पादक रामदेव द्विवेदी 📲 9453706435 🇮🇳 ऊँ टाइम्स , सम्पादक अविनाश द्विवेदी

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