आखिर राम को मिल ही गया अयोध्या का रामजन्म भूमि , सुप्रीम कोर्ट ने दिया ऐतिहासिक फैसला

OM TIMES e-news paper India
Publish Date – 10/11/2019. https://omtimes.in 2019.2नई दिल्ली  (रामदेव द्विवेदी, ऊँ टाइम्स)  राम जन्मभूमि अयोध्या के इस फैसले की प्रतीक्षा पूरा देश दशकों से नहीं, बल्कि सदियों से कर रहा था, जिसे आखिरकार उच्चतम न्यायालय की ओर से राम मंदिर के ही पक्ष में सुना दिया गया। यह वास्तव में एक नए इतिहास का निर्माण करने वाला फैसला है। अब नया इतिहास लिखने की जिम्मेदारी भारत के सभी लोगों की है। इस जिम्मेदारी का निर्वाह न्याय के प्रति सम्मान भाव प्रकट करने से ही हो सकेगा।

आखिर जस्टिस गोगोई की पीठ ने लिख ही दिया नया अध्याय –  भारतीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने अयोध्या मामले का पटाक्षेप कर एक नया अध्याय लिखने का काम किया है। इस फैसले के लिए संविधान पीठ को भी बधाई दी जानी चाहिए। अपने इस ऐतिहासिक निर्णय में देश की शीर्ष अदालत ने विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण के पक्ष में आदेश दिया है । इसके साथ ही उसने मुस्लिम पक्ष को मस्जिद निर्माण के लिए अयोध्या में ही किसी स्थान पर पाँच एकड़ जमीन आवंटित करने का भी निर्देश दिया है!

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण के लिए कार्ययोजना तैयार करने को कहा है –  सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को इसका जिम्मा सौंपा है कि वह तीन महीनों में एक ट्रस्ट बनाकर मंदिर निर्माण के लिए उचित कार्ययोजना तैयार करे। इस निर्णय ने हिंदू समाज की आशा को पूरा कर उसे उत्साहित किया है, लेकिन उसे उत्साह के स्थान पर संतोष भाव प्रदर्शित करना चाहिए। उसे सामाजिक सद्भाव की न केवल चिंता करनी होगी, बल्कि उसे हर हाल में बरकरार रखना होगा। उत्साह या असहमति के चलते ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे देश का माहौल बिगड़े। वास्तव में यह सभी का दायित्व है कि वह इस बात को सुनिश्चित करे कि देश का सामाजिक तानाबाना सुरक्षित रहे। यह इसलिए सुनिश्चित किया जाना चाहिए, क्योंकि राम सबके हैैं और सबका कल्याण ही उनके जीवन का ध्येय था। इसी के लिए वह जाने जाते थे और इसीलिए सबके मन में बसे थे।

अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद को कुछ पैरोकारों ने वोट बैैंक आधारित राजनीति का प्रश्न बना दिया था –  स्वतंत्रता के पहले की तरह स्वतंत्रता के बाद भी अयोध्या विवाद को सुलझाने की बहुत कोशिश हुई, लेकिन वह सफल नहीं हुआ। सदियों पुराना अयोध्या विवाद समय के साथ हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद के रूप में तब्दील होता गया ,और उससे सामाजिक सद्भाव को क्षति पहुंची। यह क्षति इसलिए पहुँची कि अयोध्या में मंदिर-मस्जिद के कुछ पैरोकारों ने इस विवाद को वोट बैैंक आधारित राजनीति का प्रश्न बना दिया।

ईमानदारी से विवाद को आपसी बातचीत से सुलझाने की कोशिश नहीं हुई-  विडंबना यह रही कि उन्होंने इस विवाद को आपसी बातचीत और सहमति से सुलझाने की कोशिश ईमानदारी से नहीं किया। इसीलिए यह विवाद लंबे समय तक उलझा रहा। 1992 में विवादित ढांचे के ध्वंस के बाद इस विवाद को नए सिरे से सुलझाने की कोशिश शुरू हुई, लेकिन वह भी सही तरह से आगे नहीं बढ़ पाया। नि:संदेह अयोध्या के विवादित ढांचे को जिस तरह गिराया गया वह ठीक नहीं था। इस ध्वंस से मुसलमान आक्रोशित हुए। यह आक्रोश इसलिए उपजा, क्योंकि मुस्लिम समाज को यह बताकर गुमराह किया गया कि बाबरी मस्जिद राम मंदिर की जगह नहीं बनाई गई थी। इसीलिए यह जिद सही नहीं था कि जहाँ पर ढांचा था वहीं पर मस्जिद बने। इस जिद का इसलिए भी कोई औचित्य नहीं था, क्योंकि इस्लामी मान्यताएं यही कहती हैैं कि झगड़े की जमीन पर बनी मस्जिद पर नमाज मंजूर नहीं होता है ।

किसी भी पक्ष ने इलाहाबाद उच्च न्यायलय का फैसला स्वीकार नहीं किया था –  सन् 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जब इस विवाद पर अपना फैसला सुनाया था तो उसे किसी पक्ष ने स्वीकार नहीं किया। वास्तव में इस फैसले से किसी का भी भला नहीं हो रहा था। विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किसी पक्ष को संतुष्टि नहीं प्रदान किया था , लेकिन इस फैसले ने विवाद सुलझाने का आधारशिला जरूर रखा! इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआइ ने विवादित स्थल का उत्खनन कर जो साक्ष्य जुटाया उन्होंने यह साबित किया कि मस्जिद का निर्माण खाली जमीन पर नहीं किया गया और वहां मंदिर के अवशेष मिले। ये साक्ष्य इस मान्यता के अनुरूप थे कि विवादित स्थल पर राम मंदिर था, जिसके स्थान पर बाबर के सेनापति ने जबरन मस्जिद का निर्माण कराया।

एएसआइ की रिपोर्ट की हुई थी अनदेखी –  एएसआइ के उत्खनन अभियान का हिस्सा रहे केके मुहम्मद ने बार-बार यह कहा कि विवादित स्थल पर प्राचीन मंदिर होने के प्रमाण मिले थे, लेकिन उनकी अनदेखी की गई। इतना ही नहीं एएसआइ की रपट को खारिज करने की भी कोशिश की गई। ऐसा नहीं किया जाता तो शायद विवाद पहले ही सुलझ जाता।

अयोध्या नगरी राम के नाम से ही दुनिया भर में अपनी पहचान रखती है –  इसमें किसी को कोई संदेह नहीं हो सकता कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ। चूंकि अयोध्या राम के नाम से ही पूरी दुनियां में अपनी पहचान रखती है , इसलिए ऐसे तर्क उकसाने वाले ही थे कि इसके क्या प्रमाण है कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ था ? अफसोस यह रहा कि देश के अनेक इतिहासकार और राजनेता एक लंबे अर्से तक यह दावा करते रहे कि अयोध्या में राम मंदिर पर हिंदू समाज का कोई दावा नहीं बनता। इस दावे को खारिज करने के लिए तमाम मनगढंत बातें भी कही गईं।

सुप्रीम कोर्ट में भी राम मंदिर के विरोध में थोथी दलीलें हुई थी पेश –  उच्चतम न्यायालय में 40 दिन की सुनवाई के दौरान भी कुछ पैरोकार राम मंदिर के विरोध में थोथी दलीलें देते रहे। वे जोर दे रहे थे कि यहा पर मंदिर का निर्माण नहीं होना चाहिए था। चूंकि उनके तर्क बेतुके और हास्यास्पद थे इसीलिए उच्चतम न्यायालय ने उन्हें स्वीकार ही नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर हिंदू पक्ष का दावा सत्य पाया –  अब जब उच्चतम न्यायालय ने आस्था नहीं, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर यह पाया कि अयोध्या के विवादित स्थल पर हिंदू पक्ष का दावा सही साबित होता है, तब फिर सभी को ही उसके फैसले को स्वीकार करना चाहिए। यह ठीक नहीं कि जब करीब-करीब सभी राजनीतिक दल और यहाँ तक कि सुन्नी वक्फ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार कर रहा है तब फिर ओवैसी जैसे नेताओं को कोई बखेड़ा करने से दूर रहना चाहिए।

इस फैसले को हिंदुओं की ओर से जीत के तौर पर नहीं बल्कि सत्य की जीत के तौर पर देखा जाना चाहिए –  यह स्वागतयोग्य है कि चंद लोगों और वह भी ओवैसी जैसे सांप्रदायिक राजनीति करने वाले नेताओं को छोड़कर आम मुस्लिम समाज इस फैसले को स्वीकार करता दिख रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि हिंदुओं की ओर से भी इस फैसले को जीत के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। यही सही तरीका है।

अब अयोध्या विवाद को लेकर हो रही राजनीति खत्म होना चाहिए –   यह समय सद्भाव को पुष्ट करते हुए आगे बढ़ने का है। अब कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि उच्चतम न्यायालय के फैसले के साथ अयोध्या विवाद को लेकर हो रही राजनीति का भी पटाक्षेप हो। केवल इतना ही नहीं बल्कि हिंदू-मुस्लिम समाज के बीच जो भी दूरियां हैैं उन्हें कम करने की कोशिश होनी चाहिए। यह कोशिश दोनों ही पक्षों की ओर से होनी चाहिए। ऐसा करते हुए एक-दूसरे की भावनाओं का आदर किया जाना चाहिए, क्योंकि यही भारतीय परंपरा है और इससे ही देश आगे बढ़ेगा।. …. (लेखक रामदेव द्विवेदी प्रधान सम्पादक ऊँ टाइम्स समाचार पत्र भारत )

लेखक: OM TIMES News Paper India

(Regd. & App. by- Govt. of India ) प्रधान सम्पादक रामदेव द्विवेदी 📲 9453706435 🇮🇳 ऊँ टाइम्स , सम्पादक अविनाश द्विवेदी

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  बदले )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  बदले )

Connecting to %s