अमेजन के जंगल में लगी भीषण आग, भविष्य के लिए है खतरे की घंटी है आग और ग्लेशियरों का पिघलना

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Publish Date – 25/8/2019. https://omtimes.in.
नई दिल्ली/ सिद्धार्थनगर (ऊँ टाइम्स)  हमारी धरती पर मौजूद प्राकृतिक संसाधन किसी न किसी कारणों से खत्म होते जा रहे हैं। यह भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। यदि इन प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और सहेजने के लिए अभी से कड़े कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले कुछ सालों में इसके भयानक परिणाम देखने को मिलेंगे। दुनियां का फेफड़ा कहे जाने वाले अमेजन के जंगल में लगी आग और ग्लोबल वर्मिंग की वजह से पिघल रहे ग्लेशियर इस चिंता को और भी बढ़ा रहे हैं। धरती पर मौजूद ये कुछ ऐसे प्राकृतिक स्त्रोत हैं जो पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखते हैं, यदि किसी वजह से इन प्राकृतिक स्त्रोतों को ही नुकसान पहुंचता है तो उसके परिणाम का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। इस साल कुछ माह पहले ही वैज्ञानिकों ने चेताया था कि हिमालय में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का सिलसिला चल रहा है। साल 2050 तक यहां के 650 ग्लेशियरों के पिघल जाने का अनुमान है। दूसरी ओर कुछ दिन पहले दुनिया का फेफड़ा कहे जाने वाले अमेजन के जंगल में आग लगने की घटना हो चुकी है, यहां पर आग लगने से दुनियाभर के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद परेशान है। तीन दिनों से 2500 से भी अधिक जगहों पर लगी आग –
अमेजन के जंगल में बीते तीन दिनों से 2500 से अधिक जगहों पर आग लगी हुई है। इस जंगल से पूरी दुनिया को 20 फीसद ऑक्सीजन मिलती है। दक्षिण अमेरिका के ब्राजील में मौजूद दुनिया का सबसे बड़ा वर्षा वन और दुनिया के फेफड़ों के नाम से प्रसिद्ध इस जंगल में आग बुझने का नाम ही नहीं ले रही है। आग से तबाही का मंजर भयावह होता जा रहा है। यहां आग लगने से इसके आसपास के इलाके ब्राजील के उत्तरी राज्य रोरैमा, एक्रे, रोंडोनिया और अमेजोनास बुरी तरह प्रभावित हैं।

अन्य वर्षों की अपेक्षा इस साल आग की घटनाएं हैं बढ़ीं –
ब्राजील की अंतरिक्ष एजेंसी के आंकड़े बताते हैं कि अमेजन के वर्षा वन में इस साल रिकॉर्ड आग की घटनाएं हुई हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (इनपे) ने अपने सेटेलाइट आंकड़ों में दिखाया है कि 2018 के मुकाबले इस दरम्यान आग की घटनाओं में 85 फीसद की वृद्धि हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल के शुरुआती 8 माह में ब्राजील के जंगलों में आग की 75,000 घटनाएं हो चुकी है। साल 2013 के बाद ये रिकॉर्ड है। साल 2018 में आग की कुल 39,759 घटनाएं हुई थीं।

उत्तरी ब्राजील इस आग से बुरी तरह है प्रभावित –
इस जंगल में लगी आग की घटनाओं का सबसे अधिक प्रभाव उत्तरी इलाकों में पड़ा है। रोराइमा में 141 फीसद, एक्रे में 138 फीसद, रोंडोनिया में 115 फीसद और अमेजोनास में 81 फीसद आग की घटनाओं में वृद्धि हुई है, जबकि दक्षिण में मोटो ग्रोसो डूो सूल में आग की घटनाएं 114 फीसद बढ़ी हैं। अमेजोनास ब्राजील का सबसे बड़ा राज्य है, जहां आपात स्थिति की घोषणा कर दी गई है।.                                                      आग से बड़े पैमाने पर उठ रहा है धुआं और कार्बन –
आग से पैदा हुए धुएं का विशाल गुबार पूरे अमेजन में फैल गया है और आगे बढ़ रहा है। धुआं अटलांटिक कोस्ट तक फैल चुका है। यहां तक कि 2000 मील दूर साओ पाउलो का आसमान धुएं से भर गया है। यहीं नहीं आग से बड़े पैमाने पर कार्बन डाईऑक्साइड पैदा हो रहा है। इस आग से कार्बन मोनो ऑक्साइड गैस भी पैदा हो रही है, जोकि ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में लकड़ी के जलने से पैदा होती है।

आग लगने का कारण –
जुलाई से अक्टूबर के बीच सूखे मौसम में ब्राजील के जंगलों में आग की घटनाएं होना आम बात है। यहां प्राकृतिक कारणों से भी आग लगती है, किसान और लकड़ी काटने वाले भी कई बार आग लगाते हैं। जो बाद में भयानक रुप ले लेती है।

इन देशों में आग की घटनाएं –

ब्राजील 75,000

वेनेजुएला 26,500

बोलीविया 17,200

कोलंबिया 14,200

पेरु 5,680

गुयाना 890

इक्वाडोर 290

फ्रेंच गुयाना 11                                                    क्यों महत्वपूर्ण हैं अमेजन का जंगल – 
अमेजल के इस विशालकाय जंगल में वनस्पति और जीव जंतुओं की 30 लाख प्रजातियां पाई जाती है। ये जंगल जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं, क्योंकि इसके जंगल हर साल लाखों टन कार्बन उत्सर्जन को सोख लेते हैं। जब पेड़ काटे या जलाए जाते हैं, तो उनके अंदर जमा हुआ कार्बन वायुमंडल में चला जाता है।


इस आग से दूसरे देश भी हैं प्रभावित –
अमेजन बेसिन के अन्य देशों में भी इस साल आग की घटनाएं बढ़ी हैं। इसमें ब्राजील के बाद वेनेजुएला दूसरे नंबर पर है, जबकि आग की घटनाओं के साथ बोलीविया तीसरे नंबर पर है। देश के पूर्वी हिस्से में आग बुझाने के लिए बोलीविया की सरकार ने आग बुझाने वाले एयर टैंकरों को किराए पर ले रखा है। यहां आग अभी तक छह वर्ग किलोमीटर में फैल चुकी है। इलाके में अतिरिक्त राहत और बचावकर्मी भेजे गए हैं और आग से बचकर निकलने वाले जानवरों के लिए अभयारण्य बनाए जा रहे हैं। बचाव दल दिन-रात बिना रुके आग पर काबू पाने का प्रयास कर रहे हैं।

क्या होगा इससे नुकसान-
अमेजल के जंगल में आग लगने से ऑक्सीजन में कमी होगी। इसी तरह से ग्लेशियरों के पिघलने से भविष्य में पानी की कमी होगी। ऑक्सीजन और पानी की कमी से लाखों लोगों के जीवन पर भी प्रभाव पड़ेगा।

650 ग्लेशियरों पर मंडरा रहा है पिघलने का खतरा
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमालय के 650 ग्लेशियरों पर खतरा मंडरा रहा है, ये ग्लेशियर लगातार पिघलते जा रहे हैं। यदि इसी रफ्तार से ग्लेशियर पिघलते रहे तो आने वाले कुछ सालों में हिमालय के अधिकतर ग्लेशियर पानी में तब्दील हो जाएंगे। बढ़ते पानी की वजह से जमीन पर रहने वालों को इससे अधिक समस्या का सामना करना पड़ेगा। वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन का पता लगाने के लिए अध्ययन किया। 40 साल के उपग्रह डेटा पर आधारित इस तरह के एक अध्ययन में ये बातें सामने आई हैं।.                                                                 सन् 2000 के बाद से 1.5 फीट कम हो रही है बर्फ-
साइंस एडवांसेज में प्रकाशित अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया कि हिमालय के ग्लेशियर साल 2000 के बाद से हर साल 1.5 फीट बर्फ खो रहे हैं। इस तरह से देखा जाए तो हिमालय की बर्फ पिछले 25 साल की अवधि की तुलना में कहीं अधिक तेज गति से पिघल रही है। हाल के वर्षों में, ग्लेशियरों से एक वर्ष में इतनी बर्फ पिघल चुकी है, इससे लगभग 8 बिलियन टन पानी पैदा हो चुका है। अध्ययन करने वाले लेखकों ने इसे 3.2 मिलियन ओलंपिक आकार के स्विमिंग पूल में भरे जाने वाले पानी के बराबर बताया। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट द्वारा निर्मित एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि सदी के अंत तक हिमालय अपनी बर्फ के एक तिहाई हिस्से तक को खो सकता है।

150 साल में एक डिग्री बढ़ रहा है तापमान-
पिछले 150 वर्षों में औसत वैश्विक तापमान पहले ही 1 डिग्री बढ़ गया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान में 3 से 5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। मई में नेचर में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि हिमालय के ग्लेशियर गर्मियों में तेजी से पिघल रहे हैं क्योंकि वे सर्दियों में बर्फ द्वारा फिर से बनाए जा रहे हैं।

हिमालय पर ग्लेशियरों के नष्ट होने से दो गंभीर खतरे हैं। कम समय में पिघलने वाले ग्लेशियर पहाड़ पर ही छोटे-छोटे तालाब बनाते हैं, यदि इनमें पानी की मात्रा बढ़ेगी तो इससे अधिक नुकसान होगा। यहां बसे छोटे गांव आदि खत्म हो जाएंगे। लंबी अवधि में ग्लेशियर की बर्फ के नुकसान का मतलब है कि एशिया के भविष्य के पानी का नुकसान। यदि इन ग्लेशियरों को पिघलने से रोकने की दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो लंबे समय में अत्यधिक गर्मी और सूखे के समय पानी मुहैया करा पाना बहुत ही मुश्किल हो जाएगा।

ग्लेशियर हर साल घट रहे 10 इंच –
1975 से 2000 तक, पूरे क्षेत्र के ग्लेशियर हर साल 10 इंच बर्फ खो देते हैं। 2000 में इनका पिघलना शुरू हुआ था। अब इनके नुकसान की दर दोगुनी हो गई, प्रत्येक वर्ष लगभग 20 इंच बर्फ पिघलकर पानी हो रही है। अध्ययन में यह भी निष्कर्ष निकला है। ईंधन से जलने से बर्फ के पिघलने में योगदान होता है। इन ग्लेशियरों के पिघलने का बड़ा कारक तापमान का बढ़ना था जबकि विशाल पर्वत श्रृंखला में तापमान औसत से अधिक था। पहले के वर्षों की तुलना में 2000 और 2016 के बीच काफी तेजी ग्लेशियर पिघल रहे हैं जिसका नतीजा दिख रहा है। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से वैज्ञानिक काफी चिंतित है।

जलवायु परिवर्तन ऐसी गंभीर समस्या है, जिसका समाधान निकालना बेहद जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर जलवायु परिवर्तन से 2050 तक पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ जाएगा कि ग्लेशियर पिघल जाएंगे। कार्बन उत्सर्जन की मात्रा पृथ्वी पर पांच गुना तक बढ़ जाएगी।

पेड़ और झाड़ियां भी बनेंगी ग्लेशियरों के लिए खतरा –
दरअस, असल में ग्लोबल वार्मिंग के कारण जिस तेजी से मौसम का मिजाज बदल रहा है, उसी तेजी से हिम रेखा भी पीछे की ओर खिसकती जा रही है। इससे जैवविविधता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। हिम रेखा के पीछे खिसकने से टिंबर लाइन यानी जहां तक पेड़ होते थे और हिम रेखा यानी जहां तक स्थाई तौर पर बर्फ जमी रहती थी, के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। हिम रेखा पीछे खिसकने से खाली हुई जमीन पर वनस्पतियां उगती जा रही हैं। ये वनस्पतियां, पेड़ और झाड़ियां जिस तेजी से ऊपर की ओर बढ़ती जाएंगीं, उतनी ही तेजी से ग्लेशियरों के लिए खतरा बढ़ता चला जाएगा।

कई बिजली परियोजनाएं इससे होंगी प्रभावित –
नेपाल स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट ने अनुमान व्यक्त किया है कि आने वाले 33 सालों यानी 2050 तक ऐसे समूचे हिमनद पिघल जाएंगे। इससे इस इलाके में बाढ़ और फिर अकाल का खतरा बढ़ जाएगा। गौरतलब है कि हिमालय से निकलने वाली नदियों पर कुल मानवता का लगभग पांचवां हिस्सा निर्भर है। पानी का संकट और गहराएगा। कृत्रिम झीलें बनेंगी। तापमान तेजी से बढ़ेगा। बिजली परियोजनाओं पर संकट मंडराएगा और खेती पर खतरा बढ़ जाएगा।

लेखक: OM TIMES News Paper India

(Regd. & App. by- Govt. of India ) प्रधान सम्पादक रामदेव द्विवेदी 📲 9453706435 🇮🇳 ऊँ टाइम्स , सम्पादक अविनाश द्विवेदी

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